Sector 36 : शायद डायरेक्टर को कहीं जाने की बहुत जल्दी थी, गायब क्लाइमेक्स और लचर अंत
पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही फिल्म सेक्टर 36 देखी। बताया जाता है कि यह निठारी कांड पर बेस्ड है। हालांकि शुरुआत को छोड़कर कहीं से निठारी कांड पर बेस्ड नहीं लगी। लंबे समय बाद दीपक डोबरियाल को किसी फिल्म में देखकर अच्छा लगा। विक्रांत मैसी से बहुत ज्यादा सही एक्टिंग दीपक डोबरियाल की लगी। एक सीन में जिसमें वो कहते हैं उन बच्चों में और मेरी बच्ची में फ़र्क क्या है उसमें उनके भाव कमाल के हैं...। विक्रांस मैसी साइको किलर के कैरेक्टर को पकड़ नहीं पाए या फिल्म राइटर और डायरेक्टर वैसा चाहते ही थे, पता नहीं। साइको किलर अपने अपराध को लेकर बहुत सामान्य तरीके से बात करते हैंं, जैसे उनके लिए वह अपराध है ही नहीं। लेकिन विक्रांत मैसी का कैरेक्टर बहुत उत्साह से बताता है।
हो सकता है हीरो को हीरोगिरी करते दिखाना जरूरी रहा हो। आखिरी बात यह कि इस फिल्म का अगला पार्ट लाने की जगह छोड़ी गई है। फिल्म का अंत अधूरी कहानी के साथ होता है।
फिल्म की कहानी एकदम सीधी सपाट है। कहीं-कहीं तो जबर्दस्ती का फिल्म की लेंथ बढ़ाने की कोशिश लगती है। हां, एक चीज में फिल्म कामयाब रही है- मन को घिना देती है। मारकर टुकड़े-टुकड़े करना और डेड बॉडी के साथ रेप जैसे कुछ तो फिल्म की शुरुआत में ही हैं। इसके अलावा काकचरोच को जूते से कुचलते इतना विभत्स तरीके से दिखाया गया है कि मन खराब हो जाता है। यही कुछ सीन देखने वाले को इतना डरा और घिना देते हैं कि पूरी फिल्म में उसका असर रहता है। आगे पुलिस स्टेशन में एफआईआर कराने की जद्दोजहद और दरोगा साहब (दीपक डोबरियाल) का हृदय परिवर्तन की कहानी में ही गुम होकर रह जाती है। फिल्म न तो साइको किलर के माइंड सेट को पकड़ने की कोशिश करती है और न ही उसके मालिक की भूमिका से ही पूरी तरह पर्दा उठा पाती है।
फिल्म की कहानी एकदम सीधी सपाट है। कहीं-कहीं तो जबर्दस्ती का फिल्म की लेंथ बढ़ाने की कोशिश लगती है। हां, एक चीज में फिल्म कामयाब रही है- मन को घिना देती है। मारकर टुकड़े-टुकड़े करना और डेड बॉडी के साथ रेप जैसे कुछ तो फिल्म की शुरुआत में ही हैं। इसके अलावा काकचरोच को जूते से कुचलते इतना विभत्स तरीके से दिखाया गया है कि मन खराब हो जाता है। यही कुछ सीन देखने वाले को इतना डरा और घिना देते हैं कि पूरी फिल्म में उसका असर रहता है। आगे पुलिस स्टेशन में एफआईआर कराने की जद्दोजहद और दरोगा साहब (दीपक डोबरियाल) का हृदय परिवर्तन की कहानी में ही गुम होकर रह जाती है। फिल्म न तो साइको किलर के माइंड सेट को पकड़ने की कोशिश करती है और न ही उसके मालिक की भूमिका से ही पूरी तरह पर्दा उठा पाती है।
ये पुलिस दरोगा की हृदय परिवर्तन की कहानी तो बॉलीवुड की पेटेंट कहानी है। एक पुलिस होता है, जो महा करप्ट होता है। फिर कुछ ऐसा होत है कि वह इमानदारी की मूर्ति बन जाता है। काफी घिसी-पिटी लाइन है। सेक्टर 36 में भी यही है।
फिल्म की सिनेमेटोग्राफी की भी थोड़ी बहुत बात करें तो कुछ डराने वाले विभत्स क्लोजप सीन के अलावा कुछ एक ड्रोन के शॉट हैं। जो अच्छे लगते हैं। इसके अलावा कुछ और खास तो नजर नहीं आया।

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