मुट्ठी से फिसला हुआ छुट्टी का दिन और शाम के कुछ घंटे
फाइल फोटो, साभार गूगल। मुट्ठी से जिस तरह रेत सरकती है उसी तरह छूट्टी के दिन, दिन फिसल जाता है। सुबह आधे घंटे ज्यादा सोया जाता है। दोपहर को फिर पेट भरने का इंतजाम मुश्किल से। इस तरह एक लंबी नींद लेने के बाद जब आंख खुलती है तो शाम कमरे में आ चुकी होती है। दिन तो रोज के जैसा ही रहता है लेकिन यह शाम थोड़ी तो अलग होती है। गली में कई नए चेहरे नजर आते हैं। जो अन्य दिन कभी नहीं दिखते। बर्फ गोले वाले की घंटी सुनाई पड़ती है। पड़ोसी की प्ले लिस्ट का पता चलता है। यह शाम बहुत ठहराव लिए होती है। जैसे लगता है कि दुनिया को कहीं नहीं जाना है। सब इस शाम की मंद-मंद खुशी में शरीक हैं। छुट्टी की शाम ही पता चलता है कि मुहल्ले में बच्चे भी रहते हैं। अपने मम्मी-पापा की अंगुली पकड़ कर चॉकलेट खरीदने की जिद करते हुए। हमजोलियों के साथ धमाचौकड़ी करते हुए। ये आजाद हो चुके होते हैं दस किलो के बस्ते और गले में फंसी टाई से। हां होमवर्क से अभी भी ये अपना पिंड नहीं छुड़ा पाए होते। लेकिन यह एक से दो घंटे का वक्त इनका अपना जरूर होता है। थोड़ा और बढ़िए तो एक ताजा हवा का झोंका आता है और मन को भिगो कर चला जाता है। यह परफ्य...