असम घाटी का इतिहास है ब्रह्मपुत्र की जीवनी
किताब – ‘द अनक्वाइट रिवर: ए बायोग्राफी ऑफ द ब्रह्मपुत्र’
लेखक – प्रो. अरूपज्योति सैकिया
प्रकाशन – ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इंडिया
भारत में पर्यावरण इतिहासकारों ने आमतौर पर सिंचाई, बांध, विस्थापन और बाढ़ जैसी चीजों पर लिखा है। लेकिन एक नदी के इतिहास पर बहुत कम लोग मिलेंगे। आइआइटी गुवाहाटी के प्रो. अरूपज्योति सैकिया ने इस विषय पर काफी दमदार ढ़ंग से कलम चलाई है, वह भी ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल और जटिल तंत्र वाली नदी पर। सैकिया ने अपनी किताब ‘द अनक्वेट रिवर : ए बायोग्राफी ऑफ ब्रम्हपुत्र’ में इस नदी के भौगोलिक अतीत से लेकर इसकी जैव विविधता तक पर चर्चा की है। इसमें इस बात पर भी विस्तृत चर्चा है कि किस तरह नदी ने अपने आसपास बसे लोगों और दूसरे जीव-जंतुओं के जीवन को प्रभावित किया है।
ब्रह्मपुत्र को उसके अतीत से समझने की कोशिश करते हैं तो वह एक अद्भुत नदी नजर आती है। पहाड़ों से सबसे अधिक गाद बहाकर लाने वाली नदी, शुरुआत में बेहद तेज प्रवाह और मैदान में पहुंचने के बाद एकदम धीमी पड़ चुकी नदी। यह धीमी पड़ने पर साथ में बहाकर लाई गई गाद से एक अनोखे प्रकार के मैदान और बहुत सारी धाराओं का निर्माण करती है। इस क्रम में यह बहुत सारे नदी द्वीपों का निर्माण करती है। धाराओं में बंटने की खासियत इसके कैचमेंट एरिया को कहीं कहीं 20-25 किलोमीटर तक विस्तृत कर देती है।
प्रो. सैकिया अपनी किताब में इस बात की पड़ताल करते हैं कि नदी ने किस तरह से अपनी विशेष प्रकार की भौगोलिक संरचनाओं का निर्माण किया है। नदी के आकर-प्रकार को भूगर्भीय हलचलों ने भी काफी प्रभावित किया है। इसमें 1897 और 1950 में में आए भूकंप ने तो नदी और उसके बाढ़ के मैदान को पूरी तरह बदल दिया। इस दौरान नदी पर जलवायु परिवर्तन के साथ बारिश के आंकड़ों को रखते हुए बड़ी खूबसूरती से उन्होंने अपनी बातों के पक्ष में तर्क रखा है।
ब्रह्मपुत्र बाढ़ के रूप में हर साल इतने बड़े पैमाने पर तबाही लाती है फिर भी लोग इसकी घाटी में रह रहे हैं। दोनों एक साथ कैसे चल रहा है। दरअसल ब्रह्मपुत्र की गाद से बना ऊपजाऊ मैदान इसकी वजह है जिस पर प्रागैतिहासिक काल से धान की खेती हो रही है। धान के साथ नदी से ही मिलने वाली मछलियों का ऐसा जोड़ है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद लाखों लोगों को ब्रह्मपुत्र की गोद में बसाए हुए है। उपजाऊ मैदान ने ही अहोम शासकों को तटबंध बनाकर खेती करने को प्रेरित किया। लेकिन दिलचस्प यह भी है कि ब्रह्मपुत्र जितनी ही अद्भुत इसकी सहायक नदियां भी हैं। कई तो ऐसी हैं कि गाद और पानी के मामले में ब्रह्मपुत्र को भी मात देती हैं। इन सहायक नदियों से स्थानीय लोगों ने सोना निकालने जैसे कई तरह के व्यवसाय और कला को विकिसत की। एक समय तो असम से यह सोना निर्यात भी होता था। पहले लोग अपनी मर्जी से करते थे। बाद में लाभ देखकर जमींदारों के साथ अंग्रेज भी कूद पड़े। खैर यह एक अलग कहानी है।
सैकिया के अनुसार, नदी से इतना कुछ लेने के बावजूद भी औपिनवेशिक काल से पहले इसकी बाढ़ का असर लोगों पर बहुत कम पड़ता था। इसकी बड़ी वजह यह थी कि लोग भी नदी के इकोसिस्टम को नहीं के बराबर छेड़ते थे। हालांकि वह आगे यह भी बताते हैं कि पहली ईस्वी में लोगों ने नाव बनाना शुरू कर दिया था। जिसके लिए नियमित तौर पर पेड़ों की कटाई शुरू हो गई थी। शिकार करने की प्रथाओं और पहाड़ी हिस्सों में शुरू हुई खेती का ब्रह्मपुत्र के इकोसिस्टम का क्या असर पड़ा इसके बारे में विस्तार से चर्चा नहीं किये हैं। जिसके कारण कई सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
लेखक बताते हैं कि ब्रह्मपुत्र के मैदानों में मानवीय हस्तक्षेप के जरिये होने वाला बदलाव औपनिवेशिक काल में शुरू हुआ। पहले आंग्ल-बर्मा युद्ध् के बाद 1826 में असम ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन हो गया। इसके बाद अंग्रेजों का ध्यान ब्रह्मपुत्र की ओर गया और एक मार्च 1842 को ब्रह्मपुत्र में पहला स्टीमर चला। असम कंपनी का यह स्टीमर कोलकाता से गुवाहाटी 30 मार्च को पहुंचा। जबकि नियमित स्टीमर 1846 में शुरू हुआ। प्रो. सैकिया लिखते हैं कि ऊंचाई वाले हिस्सों में चाय के बागानों और बाढ़ के मैदानों में जूट की खेती ने असम को जितना बदला उसना शायद किसी और कार्य ने नहीं। चाय के बागानों की कीमत हजारों साल से अनछुए रहे जंगलों ने चुकाई। बड़ी संख्या में श्रम की जरूरत पड़ी तो दूसरे राज्यों मजदूर लाए गए। जिन्हें गिरमिटिया कहा गया। जूट आने से पहले असम के लोग ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के बीच की जमीन पर सिर्फ ठंड के मौसम में खेती करते थे। लेकिन अंग्रेजों ने इस जमीन को राजस्व के बड़े स्रोत के रूप में देखा और जूट की खेती करने के लिए बंगाल के लोगों को लेकर आए। उन्हें यहां स्थाई तौर पर बसया गया। जूट की खेती ने न सिर्फ ब्रह्मपुत्र के बाढ़ के मैदानों के परिस्थितिकी को बदलने का काम किया बल्कि 20वीं सदी की शुरुआत में यहां भूमि को लेकर संघर्ष भी शुरू हो गए। नदी के द्वीपों पर स्थाई तौर पर जूट की खेती शुरू होने से कई उन जीवों पर बेहद बुरा असर पड़ा जो इनका इस्तेमाल प्रवास के मार्ग के रूप में करते थे। सैकिया कहते हैं कि जूट ब्रह्मपुत्र के मैदानों पर ब्रिटिश साम्राज्य के विजय का प्रतीक था। यहीं से वह समय शुरू होता है बाढ़ को लेकर लोगों की धारणा बदलने लगती है। बाढ़ एक समस्या हो गई और बांध व तटबंध बनाने की मांग भी जोर पकड़ने लगी। हालांकि अंग्रेजों और अहोम शासकों ने बाढ़ नियंत्रण पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। बाढ़ नियंत्रण आजादी के बाद राज्य की नीति का केंद्रीय बिंदु बना।
प्रोफेसर सैकिया बताते हैं कि 1950 का भीषण भूकंप ब्रह्मपुत्र घाटी में एक बार फिर से कई बड़े बदलाव लेकर आया। इसकी ही वजह से 1954 में भयंकर बाढ़ आई। दरअसल भूकंप की वजह से नदी का तल ऊपर उठ गया था और उसकी धारा में भी काफी परिवर्तन हुआ था। इसके बाद बाढ़ असम की राजनीति का मुख्य बिदु बन गई और बड़े पैमाने पर बांधों और तटबंधों का निर्माण शुरू हुआ। लेकिन शायद ही इनका कोई खास लाभ मिला हो। इसके उलट ये उपाय बाढ़ के मैदान की परिस्थितिकी बदल देते हैं। सैकिया का तर्क है कि असम की बाढ़ को राष्ट्रीय समस्या के तौर पर नेता, नौकरशाह और इंजीनियरों ने पेश किया और उसका समाधान खोजने का दावा किया। समाधान के तौर पर इन्होंने तटबंध और जल भंडारण करने वाले विशाल बांध बनाने की सलाह दी। देश के योजनाकारों की नजर में ऐसे बांध बिजली उत्पादन बढ़ाने का साधन नजर आते हैं। वह ब्रह्मपुत्र घाटी में ऐसी हिमाकत के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहते हैं कि नदी द्वारा निर्मित मैदान बेहद अस्थिर और पारिस्थितकीय तौर पर बेहद नाजुक हैं।
इस किताब में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी के बहुत सारे मुद्दों पर बात की गई है। लेकिन इसका केंद्रीय तत्व ब्रह्मपुत्र का प्राकृतिक इतिहास और आसपास रहने वालो जीवों को गढ़ने की प्रक्रिया ही है। हालांकि सैकिया का नदी के सांस्कृतिक पहलुओं पर नहीं के बराबर चर्चा करना थोड़ा अखरता है। जबकि वह कहते हैं कि इस नदी को लोगों के बीच कई तरह की उपाधियों जैसे रहस्यमयी , प्रत्याशित आदि से नवाजा जाता रहा है। असमिया साहित्य का जिक्र है लेकिन लोक कथाएं भी होनी चाहिए थी। दूसरी बात वह इसे नदी की बायोग्राफी कहते हैं जबकि सिर्फ 700 किलोमीटर की ही चर्चा करते हैं। नदी की लंबाई 2900 किलोमीटर है। हालांकि इन सब के बावजूद यह नदी पर लिखी गई शानदार किताब है। भविष्य में नदियों पर किताब लिखने वाले दूसरे लोगों के लिए यह एक मानक बन सकती है।

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